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सोमवार, अक्तूबर 23, 2017

शाइरी इस तरह भी होती है

बन्द आँखों में रोशनी सी है
जैसे जी में ही शम्अ जलती है

उसने पूछा के ख़्वाब कैसा था
कह न पाया हसीं तू जितनी है

अपने घर में ही मिस्ले मिह्माँ हूँ मैं
लब तो हँसते हैं आँख गीली है

इसकी फ़ित्रत में जब है तारीकी
पूछते क्यूँ हो रात कैसी है

और कितना उघार दूँ ख़ुद को
जिस्म पर अब फ़क़त ये बंडी है

एक अर्सा हुआ सताए हुए
किसकी जानिब निग़ाह तेरी है

इश्क़ और पत्थरों का रिश्ता है गर
हुस्न की शब् भी करवटों की है

क़त्ल हो जाए कोई देखे से ही
शाइरी इस तरह भी होती है

कुछ भी कह दे के आए कल ग़ाफ़िल
वर्ना यह वस्ल आख़िरी ही है

-‘ग़ाफ़िल’