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रविवार, जुलाई 30, 2017

जा और किसी को यार बना

ख़ुद का ख़ुद ही मुख़्तार बना
यूँ ग़ाफ़िल भी सरदार बना

यह दुनिया फ़ख़्र करे तुझ पर
ऐसा अपना किरदार बना

मन-मुटाव जो काट-छाँट दे
ऐसी ख़ासी तलवार बना

गुल कब तक साथ निभाएँगे
तू इक दो साथी ख़ार बना

सच है बस समझ के बाहर है
के है प्यार भी कारोबार बना

मैं ग़ाफ़िल हूँ नासमझ नहीं
जा और किसी को यार बना

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जुलाई 28, 2017

रविवार, जुलाई 23, 2017

सचबयानी

ज़र्द रू, ख़ामोश लब और आँखों में अश्कों का रक्स
इस तरह भी हो रही कुछ सचबयानी, देखिए!

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)

शनिवार, जुलाई 22, 2017

मेरे ख़ार काम आया है

आदाब दोस्तो!

कोई भी दिल तो कभी हो सका न अपना मक़ाम
हर एक लब पे मगर अपना नाम आया है

तमाम फूल किसी और के लिए होंगे
है आया जब भी मेरे ख़ार काम आया है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 20, 2017

सोमवार, जुलाई 17, 2017

ख़ार की बातें करो

अब हुआ जाता है बिन इज़्हार ही इक़रारे इश्क़
लुत्फ़ यूँ जाता रहा, तकरार की बातें करो
सुन रहा हूँ जाने कब से हो रही फूलों की बात
टेस्ट एहसासों का बदले, ख़ार की बातें करो

-‘ग़ाफ़िल’

जाम ग़ाफ़िल ज़रा छुपा रखिए

आईना आपसे ख़फ़ा है अगर
फिर तो अब हमसे राबिता रखिए
हैं यहाँ लोग आज संज़ीद:
जाम ग़ाफ़िल ज़रा छुपा रखिए

-‘ग़ाफ़िल’

आजमाऊँ ख़ुद को मैं

झम झमाझम मेघ बरसे कड़कड़ाती बिजलियाँ
हिज़्र की तारीक शब् में आजमाऊँ ख़ुद को मैं
किस ख़ता की दी सज़ा सावन में तन्हा कर मुझे
बन सँवर कर जाने जाना क्या रिझाऊँ ख़ुद को मैं

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जुलाई 15, 2017

लौटा है क्या ख़ाक कमाकर

झलक रहा है ऐसे गौहर
ज्यूँ पेशानी पर श्रमसीकर

बुन सकता हूँ मैं ज्यूँ रिश्ता
ख़ाक बुनेगा वैसा बुनकर

जो था तुझमें तू, ग़ायब है
लौटा है क्या ख़ाक कमाकर

दाग रहे सब शे’र शे’र पर
जान बचे अब शायद सोकर

ग़ाफ़िल रात रात भर चन्दा
क्या पाया टहनी पर टँगकर

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जुलाई 12, 2017

जाम खाली न हुआ और वो भर जाता है

है लगे आज रुकेगा वो मगर जाता है
क्या पता है के कहाँ सुब्ह क़मर जाता है

लोग आते हैं चले जाते है कर तन्हा मुझे
तू तो रुक जाए इधर यार किधर जाता है

आया है करने जो आबाद मेरे दिल का नगर
उसको तो रुकना ही था देखिए पर जाता है

इस क़दर चाहने वाला है मेरा भी कोई
जाम खाली न हुआ और वो भर जाता है

बाद दीदार के तेरे है अजब ये होता
आईना देख मुझे ख़ुद ही सँवर जाता है

हूँ तो ग़ाफ़िल ही मगर तुझसे तो इस तर्ह नहीं
के मेरे नाम पे जैसे तू बिफर जाता है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जुलाई 05, 2017

कोई शब् भर मनाता था किसी का रूठ जाना था

आदाब! दो शे’र आप सबको नज़्र-

तसव्वुर में गुज़ारीं जागकर मैंने कई शब् पर
उन्हें आना नहीं आया जिन्हें ख़्वाबों में आना था

हसीं रातें थीं वे फिर भी भले तारीक रातें थीं
कोई शब् भर मनाता था किसी का रूठ जाना था

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जुलाई 04, 2017

भाते हैं गो मुझे भी नफ़ासत के रास्ते

तक़्दीर है के चलता हूँ ग़ुरबत के रास्ते
भाते हैं गो मुझे भी नफ़ासत के रास्ते

मेरे लिए ही बन्द हुई जा रही है क्यूँ
वह क़ू जहाँ से जाते हैं किस्मत के रास्ते

तुह्मत लगाई जाती यूँ आवारगी की क्या
चल देता गर कभी मैं ज़ुरूरत के रास्ते

पा जाऊँगा ही तुझको हो ग़ाफ़िल यक़ीं अगर
तो क्यूँ क़ुबूल कर न लूँ ज़ुर्रत के रास्ते

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जुलाई 03, 2017

काश! के फिर बन पाता रिश्ता

अब दुश्वार है जीसस बनना
गया रिवाज़ सलीबों वाला

ख़ारेपन से बच जाता गर
सागर थोड़ा भी रो लेता

सर्पिल सी इक पगडण्डी से
काश! के फिर बन पाता रिश्ता

अब वह शायद टूट चुकी है
जिस टहनी पर चाँद टँगा था

लौट आओगे तब न दिखेगा!
बूढ़ा पीपल बाट जोहता

लगने लगा अब ख़्वाब मुझे क्यूँ
ओरी छप्पर पानी झरता

ग़ाफ़िल गौरइयों के चूजे
कोटर वाला साँप खा गया

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)