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शुक्रवार, अप्रैल 28, 2017

इस तरह अपने मुक़द्दर एक जैसे हो गए

हाले कमतर हाले बरतर एक जैसे हो गए
दरमियाँ तूफ़ान सब घर एक जैसे हो गए

हमको मिल पाया न मौक़ा उनको मिल पाई न अक़्ल
इस तरह अपने मुक़द्दर एक जैसे हो गए

एक पूरब एक पच्छिम दिख रहा था जंग में
और जब आए वो घर पर एक जैसे हो गए

राह के क्या मील के क्या आपके तो राज में
किस अदा से सारे पत्थर एक जैसे हो गए

सोच ग़ाफ़िल फिर सफ़र अपना कटेगा किस तरह
रहबरो रहजन कहीं गर एक जैसे हो गए

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अप्रैल 25, 2017

चीख उठती है कुछ मकानों से

आपको हो यक़ीन या के न हो
गो सुना मैंने अपने कानों से
हाँ ये सच है के आधी रात के बाद
चीख उठती है कुछ मकानों से

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 24, 2017

सोचता हूँ के अगर जाऊँगा तो क्या लेकर

होते फिर शे’र मेरे क़ाफ़िया क्या क्या लेकर
बात बन जाती लुगत का जो सहारा लेकर

लिख दिया मैंने अभी एक अजूबा सी हज़ल
कह दो तो पढ़ दूँ यहाँ नाम ख़ुदा का लेकर

एक क़त्आ-

वैसे तो जी में मेरे आप अब आने से रहे
और मालूम है आएँगे भी तो क्या लेकर
फिर भी आ जाइए है रात गुज़रने वाली
वास्ते मेरे भले दर्द का गट्ठा लेकर

और तमाम अश्आर-

जैसे अरमानों का बाज़ार हुआ जी अपना
औ ख़रीदार खड़े ढेर सा पैसा लेकर

सोचता हूँ के मेरी भूख की शिद्दत में कभी
काश आ जाए कोई लिट्टी-ओ-चोखा लेकर

क्या था रंगीन सफ़र जाम भी टकराया था
वैसे निकला था मैं बस थोड़ा सा भूजा लेकर

होने ही चाहिए अश्आर हमेशा हल्के
ताके जाना न पड़े झाड़ में लोटा लेकर

कोई तारीफ़ नहीं कोई मलामत भी नहीं
सोचता हूँ के अगर जाऊँगा तो क्या लेकर

आईना ठीक ही कहता है के आ जाते हो क्यूँ
आप ग़ाफ़िल जी वही चेहरा बना सा लेकर

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 14, 2017

ज़रा अब देख तो ले है बचा क्या

तुझे चाहा, है हिज़्र इसकी सज़ा क्या
बता मेरी ख़ता है और क्या क्या

दहकती आग सी आँखों में तेरी
कोई अब भी तो डूबा है, जला क्या

ज़माना हो गया आतिश उगलते
ज़रा अब देख तो ले है बचा क्या

शरारा जो छुपाया था तू जी में
सवाल अब है के शोला बन उठा क्या

मेरे ख़त का था गो मज़्मून वाज़िब
नहीं मालूम है तूने पढ़ा क्या

कभी भी तो न अपने सिलसिले थे
बहारों से अब अपना सिलसिला क्या

अरे ग़ाफ़िल तू क्या क्या बक रहा है
तेरा अब होश भी जाता रहा क्या

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अप्रैल 13, 2017

शिक़्वा नहीं हमें है ज़रा भी गुलाब से

क्या बुझ सकी है प्यास किसी की शराब से
पाएगा कोई फ़ैज़ भी क्या मह्वेख़्वाब से

है रंज़ बस यही के हमारा नहीं है यह
शिक़्वा नहीं हमें है ज़रा भी गुलाब से

चुग़ली सी कर रहा है हमारे रक़ीब की
इक झाँकता गुलाब तुम्हारी किताब से

हर सू से ख़ुद ही आती है वर्ना हमारा क्या
है राबिता किसी की भी बू-ए-शबाब से

ग़ाफ़िल किसी को इसका भी क्या इल्म है ज़रा
मिलता मक़ाम कौन सा है इज़्तिराब से

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अप्रैल 11, 2017

पाँव को मैं पाँव सर को सर लिखूँगा

और कितना चश्म को ख़ंजर लिखूँगा
अब न यूँ कुछ ऐ मेरे दिलबर लिखूँगा

बोझ गो सारे बदन का ढो रहा है
पाँव को पर सर भला क्यूँकर लिखूँगा

सच बयानी रास आए या न आए
पाँव को मैं पाँव सर को सर लिखूँगा

और कुछ लिक्खूँ न फिर भी कुछ न कुछ तो
मैैं तेरी वादाख़िलाफ़ी पर लिखूँगा

कर न पाया तू ग़मे दिल को रफ़ा तो
जाँसिताँ तुझको भी चारागर लिखूँगा

मानता हूँ मैं मुसन्निफ़ हूँ नहीं पर
जब लिखूँगा और से बेहतर लिखूँगा

हूँ मगर इतना भी मैं ग़ाफ़िल नहीं हूँ
ख़ुद की जो आवारगी अक़्सर लिखूँगा

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 10, 2017

सच्ची रह पकड़ा सकता है

जी उस पर ही आ सकता है
दिल जो शख़्स गंवा सकता है

बेपरवा सा हुस्न इश्क़ को
बेमतलब तड़पा सकता है

देख के तेरे लब पे तबस्सुम
मेरा ग़ुस्सा जा सकता है

इंसाँ बस मजनू हो जाए
कंकड़ पत्थर खा सकता है

तेरी पेशानी का पसीना
मेरा हसब बता सकता है

जान भी पाया कौन इश्क़ में
क्या खोकर क्या पा सकता है

अब आलिम रब ही ग़ाफ़िल को
सच्ची राह दिखा सकता है

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 07, 2017

आईना रंग क्यूँ बदलता है

मान लेना न यह के पक्का है
आदमी आदमी का रिश्ता है

यूँ तो लाखों गिले हैं ज़ेरे जिगर
कौन तेरा है कौन मेरा है

इश्क़ की क्या नहीं है ये तौहीन
दिल सुलगता है और तड़पता है

पुख़्ता हूँ ख़ूब ज़िस्मो जान से मैं
हादिसों से जो मेरा नाता है

न डरेगा भी तो डराएगी
कुछ इसी ही सिफ़त की दुनिया है

देख रुख़ पर मेरे है दाग़ तो क्या
चाँद भी वाक़ई कुछ ऐसा है

गोया होता हूँ मैं वही ग़ाफ़िल
आईना रंग क्यूँ बदलता है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अप्रैल 06, 2017

बोलिए क्या शे’र मेरा भी हुआ

रूबरू होने पे क्यूँ ऐसा लगा
है मिजाज़े आईना बिगड़ा हुआ

आईना करता नहीं गोया गिला
सामने उसके मगर अच्छे से आ

टूटने का दौर है मौला ये क्या
लग रहा जो हर बशर टूटा हुआ

था नहीं इसका गुमाँ मुझको ज़रा
मेरा ही दिल एक दिन देगा दगा

चल रहा था वस्ल का ज्यूँ सिलसिला
एक दिन होना ही होना था ज़ुदा

था शरारा इश्क़ का ज़ेरे जिगर
वो ही शायद आज बन शोला उठा

फिर नये पत्ते निकल आएँगे ही
फिर बहार आएगी इतना है पता

मेरी आसानी परेशानी न पूछ
चल रहा मौसम अभी तक हिज़्र का

होंगे आशिक़ और तेरे, शह्र में
पर नहीं होगा कोई मुझसा फ़िदा

हुस्न को परवा नहीं जब है मेरी
हुस्न की परवाह मुझको क्यूँ भला

पी के जो मै लोग शाइर हो गए
मैं भी तो इक घूँट उसको हूँ पिया

रख दिया कुछ हर्फ़ ग़ाफ़िल, बह्र में
बोलिए क्या शे’र मेरा भी हुआ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अप्रैल 04, 2017

तेरी जो लत है जी चुराने की

बेबज़ा को बज़ा बताने की
कोशिशें हो रहीं ज़माने की

ज़िन्दगी की फ़क़त है दो उलझन
एक खोने की एक पाने की

पहले आ शब गुज़ार लें मिलकर
बात सोचेंगे फिर बहाने की

मेरा भी जी चुराया होगा तू
तेरी जो लत है जी चुराने की

एक क़त्आ-

ख़ुश्बू-ओ-गुल हैं पहरेदार जहाँ
राह कोई न जाके आने की
ख़ासियत क्या बयाँ करे ग़ाफ़िल
तेरी ज़ुल्फ़ों के क़ैदख़ाने की

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 03, 2017

हुस्न भी लेकिन शराफ़त से रहे

जैसे भी चाहे कोई वैसे रहे
जब तलक ज़़े़े़े़ेरे जिगर मेरे रहे

हो चुका है गर ज़माना ग़ैर का
आप भी तो अब कहाँ अपने रहे

ठीक है डंडे जमाओ इश्क़ पर
हुस्न भी लेकिन शराफ़त से रहे

मस्त है अपनी ही धुन में हर कोई
किसको समझाए कोई कैसे रहे

झंड है ग़ाफ़िल जी अपनी ज़िन्दगी
हम न घर के ही न बाहर के रहे

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अप्रैल 01, 2017

ग़ाफ़िल दिल के बीमारों से क्या लेना

सब्ज़ शजर को अंगारों से क्या लेना
एक बाग़बाँ को आरों से क्या लेना

भौंरे तो गुल का रस लेते हैं उनको
ऐ गुलाब तेरे ख़ारों से क्या लेना

चश्म देख सकते हैं फ़क़त बदन सबके
उनको सबके किरदारों से क्या लेना

लाख बनाता रहे राइफ़ल पिस्टल तू
उल्फ़त में इन हथियारों से क्या लेना

है रसूल देने वाला जब, फिर मुझको
दिल के मुफ़्लिस दरबारों से क्या लेना

हूँ मुरीद तेरा मौला, तू हुक़्म करे
मुझको तेरे हरकारों से क्या लेना

सुह्बत सेहतमंदों की होती अच्छी
ग़ाफ़िल दिल के बीमारों से क्या लेना

-‘ग़ाफ़िल’